इस्लाम की तारीख़ में बहुत सी घटनाएँ हुई हैं, लेकिन कर्बला का वाक़िआ सिर्फ़ एक जंग की कहानी नहीं है। यह हक़ और बातिल, इंसाफ़ और ज़ुल्म, किरदार और सत्ता की लड़ाई की ऐसी मिसाल है जो आज भी इंसानों को हिम्मत देती है।
हज़रत इमाम हुसैन (रज़ि.) और यज़ीद के बीच का मामला सिर्फ़ दो लोगों का झगड़ा नहीं था। यह उसूलों और ताक़त के बीच का मुकाबला था।
जब यज़ीद ने अपनी हुकूमत को मज़बूत करने के लिए लोगों से बैअत माँगी, तो बहुत से लोगों ने दबाव या हालात की वजह से उसे स्वीकार कर लिया। लेकिन इमाम हुसैन ने एक अलग रास्ता चुना। उन्होंने साफ़ कहा कि अगर हुकूमत इंसाफ़, सच्चाई और दीन की बुनियादी तालीमात से दूर हो जाए, तो उस पर सवाल उठाना ज़रूरी है।
इमाम हुसैन जानते थे कि यह रास्ता आसान नहीं है। उन्हें पता था कि इसके नतीजे बहुत दर्दनाक हो सकते हैं। लेकिन उन्होंने अपने ज़मीर का सौदा नहीं किया।
कर्बला के मैदान में उनके साथ सिर्फ़ कुछ दर्जन साथी थे, जबकि सामने हज़ारों का लश्कर था। पानी बंद कर दिया गया। बच्चे प्यासे थे। औरतें परेशान थीं। हालात इतने कठिन थे कि इंसान का दिल काँप जाए।
लेकिन इमाम हुसैन ने हार नहीं मानी।
उन्होंने दुनिया को सिखाया कि कामयाबी सिर्फ़ जीत जाने का नाम नहीं है। कभी-कभी कामयाबी अपने उसूलों पर आख़िरी सांस तक डटे रहने का नाम भी होती है।
10 मुहर्रम 61 हिजरी को कर्बला की रेत पर इमाम हुसैन और उनके साथियों ने शहादत पाई। देखने वालों को लगा होगा कि ताक़त जीत गई और कमज़ोर हार गए।
लेकिन इतिहास ने कुछ और फैसला सुनाया।
आज दुनिया भर में करोड़ों लोग इमाम हुसैन का नाम इज़्ज़त और मोहब्बत से लेते हैं, जबकि कर्बला का ज़िक्र आते ही ज़ुल्म और जब्र के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद होती है।
कर्बला हमें यह सबक देती है कि:
* अगर पूरी दुनिया एक तरफ़ खड़ी हो और सच दूसरी तरफ़, तो सच का साथ नहीं छोड़ना चाहिए।
* हालात कितने ही मुश्किल क्यों न हों, इंसान को अपने ज़मीर के खिलाफ़ नहीं जाना चाहिए।
* ताक़त हमेशा जीत की गारंटी नहीं होती, किरदार और सच्चाई भी इतिहास बदल देते हैं।
* कभी-कभी एक छोटी सी कुर्बानी आने वाली नस्लों के लिए रोशनी का रास्ता बन जाती है।
आज जब हम अपने आसपास नाइंसाफ़ी, झूठ और ज़ुल्म देखते हैं, तो कर्बला की याद हमें हिम्मत देती है। यह बताती है कि इंसान की असली पहचान उसकी दौलत, ताक़त या ओहदे से नहीं, बल्कि उसके उसूलों से होती है।
कर्बला की सबसे बड़ी सीख यही है कि इंसान हार कर भी जीत सकता है, अगर वह अपने उसूलों और सच का दामन न छोड़े।
“सर कटा सकते हैं, लेकिन हक़ के सामने सिर झुका नहीं सकते। यही कर्बला है, यही हुसैनियत है।”
इमाम हुसैन का पैग़ाम सिर्फ़ मुसलमानों के लिए नहीं, बल्कि हर उस इंसान के लिए है जो सच, इंसाफ़ और इंसानियत पर यक़ीन रखता है। खासतौर पर आज के हालत पर तो यह पैग़ाम एकदम सटीक बैठता है, कुछ लोग कहते हुए घूम रहे हैं कि हक़ का साथ देने की जगह ग़द्दारी करने वालों ने एकदम सही किया, सारा ठेका हमने नहीं लिया है। तो उन्हें इमाम हुसैन का पैग़ाम ऐसे लोगों की असलियत खोलकर उनका असल चेहरा सबके सामने रख देता है कि कौन हुसैनियत की तरफ़ है और कौन यज़ीदियत की तरफ़…


0 comments:
Post a Comment